आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी,
नमस्कार,
आशा करता हूं कि आप स्वस्थ और सकुशल होंगे। मुझे यह भान है कि कोरोना महामारी ने आप पर जिम्मेदारियों का बोझ और बढ़ा दिया है लेकिन यह विश्वास भी है कि आप जैसा योद्धा इसे आसानी से जीतने में सक्षम हैं। मेरा पत्र लिखने का प्रयोजन आपको कुछ महत्वपूर्ण आर्थिक पहलुओं से अवगत करना है। मुझे विश्वास भी है कि आप मेरी बात को सुनेंगे और अमल में लाएंगे।
कोरोना से दुनियाभर में लाखों लोग मरे और बेरोजगार हुए हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। यहां भी 40 करोड़ लोगों को बेरोजगार होने का खतरा है। लॉकडाउन के एक माह भी नहीं हुए और देश के लाखों
गरीब मजदूर दो वक्त की रोटी के लिए दर-बदर भटक रहे हैं। अपने ने भी गरीबों की मदद करने का आह्वाहन किया है लेकिन स्थिति भयावह बनी हुई है। आखिर, देश में ये नौबत क्यों आई कि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लाखों मजदूर शहर से भांगने को मजबूर हुए। इसका सबसे बड़ा करण हमारे देश का खोखला इकोनॉमी मॉडल है। आजादी के 75 साल के बाद भी हम अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस का इकोनॉमी मॉडल फॉलों कर रहे हैं लेकिन मेरा मानना है कि वह हमारे देश के लिए माकूल नहीं है।
इसका अहसास आपको इस कोरोना संकट ने करा ही दिया है। कंपनियों ने अपनी जिम्मदारियों से पल्ला झाड़ लिया है। अधिकांश कंपनियां बेल आउट पैकेज की मांग कर रही हैं। सरकार की ओर से राहत मिलने के बाद भी उनके पास अपने मजदूरों और कर्मचारियों को देने के लिए पैसे नहीं हैं।
कॉरपोरेट टैक्स में छूट के तौर पर 1.45 लाख करोड़ से लेकर कोरोना संकट के बीच में कई लाख करोड़ के पैकेज सहित सस्ते कर्ज समेत कई रियायतें देने की घोषणा सरकार ने की है। बैंकों के लाखों करोड़ का एनपीए इन्ही कंपनियों पर है। इसके बावजूद एक महीने का संकट ये कंपनियां झेलने को तैयार नहीं है। यह तय है कि कंपनियां आने वाले दिनों में इस संकट का फायदा उठाकर छंटनी और वेतन में बढ़ोतरी नहीं करेगी। फिर क्या फायदा ऐसे इकोनॉमी मॉडल का जो संकट में एक महीने भी आम लोगों का बोझ उठाने में सक्षम नहीं है।
आप भारत की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलयन डॉलर बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। मैं मान भी लूं कि आप उसे पा लेंगे तो भी क्या फायदा मिलेगा। आसमानता की खाई और गहरी हो जाएगी। आगे भी कोरोना जैसा कोई संकट आएगा तो आम जनता भूखे पेट सोने को मजबूर होगी। हम सभी जानते हैं कि आप कड़े फैसले लेकर बदलाव के पक्षधर हैं। आपके विरोधी 56 इंच का मजाक उड़ाते हैं लेकिन मैं उनमें विश्वास नहीं रखता। कोरोना महामारी ने एक बार फिर से आपको यह मौका दिया है आप कुछ कठोर फैसले लेकर लाखों गरीबों का भला करें।
मैं आपका ध्यान खेत-खलिहान और किसान पर लाना चाहता हूं जो आजादी के 75 साल बाद भी इस चकाचौध विकास से कोसों दूर हैं लेकिन आज वह इस संकट की घड़ी में आपके, हमारे साथ सबसे आगे है। एक महीने से फैक्ट्रियों में कार से लेकर मोबाइल का उत्पादन नहीं हुआ है लेकिन किसी की सेहत पर फर्क नहीं पड़ा है। अगर इतने दिन भोजन न मिलें तो स्थिति क्या होगी यह सोच कर ही रोंगते खड़े हो जाते हैं।
मेरा आपसे अनुरोध है कि आप 10% के लिए बने इस इकोनॉमी मॉडल को बदलें। आज भी खेती पर 56% जनता निर्भर है। फिर क्यों नहीं आप खेती-किसानी के मॉडल को मजबूत बनाते हैं जो संकट में साथ भी निभाए औैर जनता का भरण-पोषण करें। मैं उद्योगों के खिलाफ नहीं हूं लेकिन वह सिर्फ कुछ शहरों तक सीमित न हों। वह गांव के आसपास के शहरों तक जाएं और वहां की आबादी को काम दें। मुझे भरोस है कि आप यह कर सकते हैं। अब वक्त आ गया है कि 135 करोड़ लोगों का ध्यान रखकर इकोनॉमी का मॉडल तैयार किया जाएगा।
आपका शुभचिंतक,
आलोक
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