चीन की प्रॉपर्टी कीमतें हाल के रिकॉर्ड में करीब 2005 के स्तर तक गिर चुकी हैं, जिससे दुनियाभर के निवेशकों के बीच चिंता पैदा हुई है। स्वाभाविक रूप से, भारत में भी निवेशक और घर खरीदार मुझसे अक्सर पूछते हैं कि क्या भारत का रियल्टी मार्केट भी इसी तरह धराशायी (Crash) हो जाएगा? एक एक्सपर्ट और डेवलपर के तौर पर, बिहार और पूरे भारत की नब्ज टटोलने के बाद, मेरा जवाब एक दृढ़ ‘ना’ है।
भारतीय और चीनी रियल एस्टेट मार्केट की तुलना करना, सेब और संतरे की तुलना करने जैसा है। चीन का संकट ओवरसप्लाई, अत्यधिक कर्ज और ‘निवेश के लिए घर’ वाली संस्कृति के कारण था। लेकिन भारत की कहानी पूरी तरह से अलग है। यह कहानी ‘निवेश’ की नहीं, बल्कि जरूरत और विकास की बुनियाद पर टिकी हुई है।
डिमांड न तो खत्म हुई है और न ही घटने वाली है
भारत की आबादी तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रही है। लाखों नए घरों की आवश्यकता हर साल उत्पन्न होती है क्योंकि युवा परिवार पहली बार घर खरीदना चाहते हैं, अपग्रेड करना चाहते हैं या निवेश के बजाय स्थायी आवास के लिए खरीदारी कर रहे हैं। यह डिमांड चीन की तरह निवेश-फॉर-रिकॉर्ड-गैन की वजह से नहीं है, बल्कि आवासीय ज़रूरत की वजह से है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है।
चीन की समस्या और भारत की मजबूती में बड़ा फर्क
चीन की समस्या का मूल कारण अत्यधिक आपूर्ति और निवेश-प्रेरित बाजार रहा है—जहां developers भारी leverage लेते हैं और घर खाली पड़े रहते हैं। चीन में लाखों खाली यूनिट्स हैं जिनका उपयोग नहीं हो रहा। भारत में ऐसा नहीं है। भारत में नोटबंदी, RERA और GST जैसे सुधारों के बाद मार्केट में पारदर्शिता बढ़ी है, जिससे वास्तविक खरीदारी को बढ़ावा मिला है।
भारत में विस्तार सिर्फ मेट्रो तक सीमित नहीं
भारत में विस्तार सिर्फ मेट्रो तक सीमित नहीं रहा। एनसीआर, पुणे, मुंबई जैसे शहरों के अलावा टियर-2 और टियर-3 शहरों में रियल एस्टेट डिमांड और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास तेजी से बढ़ा है। हाल ही में यूपी-RERA ने 400 से अधिक नए प्रोजेक्ट्स को मंज़ूरी देने का निर्णय लिया है, जिससे इन क्षेत्रों में सप्लाई और उससे पहले की तुलना में बन रही डिमांड को बेहतर तरीके से पूरा किया जा सकेगा। जब एक नया हाईवे बनता है, तो वह अपने साथ नए उपनगर और शहर बसाता है। टियर-2 और टियर-3 शहर अब रियल एस्टेट के नए हॉटस्पॉट बन रहे हैं। नए इंफ्रा के कारण कनेक्टिविटी बढ़ी है, जिससे इन इलाकों में जमीन की वैल्यू और घरों की मांग, दोनों बढ़ रही हैं।
घर एक आवश्यकता है, निवेश नहीं
भारत में रियल एस्टेट क्रैश की परिभाषा उस तरह की गिरावट नहीं सम्भव बनाती जो चीन में हो रही है। चीन में अधिक सप्लाई और भारजी कर्ज के कारण मांग गिर रही है। भारत में घर खरीदना आज भी एक आवश्यकता और जीवन-लक्ष्य है। चीन के विपरीत, भारतीय खरीदार अधिकांशतः अपने रहने के लिए घर खरीदते हैं, न कि सिर्फ निवेश के लिए। इसलिए मांग प्रत्येक आर्थिक चक्र में बनी रहती है— खासकर जब आय बढ़ती है और परिवार अपने स्थायी आवास की चाहत रखते हैं। भारत में घर एक भावनात्मक और सामाजिक ‘जरूरत’ है। हमारे यहां ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ की मूलभूत अवधारणा है। रिपोर्टों के अनुसार, भारत में अभी भी शहरी क्षेत्रों में लगभग 1.8 से 2.9 करोड़ घरों की भारी किल्लत है। जब तक यह डिमांड-सप्लाई गैप नहीं भरता, क्रैश की कोई संभावना नहीं है।