आर.टी. ई. (RTE) के पैसों की मांग, आंदोलन को बाध्य संगठन।
राइट टू एजुकेशन एक्ट 2009 के तहत 25% गरीब वर्ग के बच्चों को मुफ्त शिक्षा दिए जाने का प्रावधान है।
सरकार के आदेशानुसार बिहार के सभी निजी विद्यालयों ने शिक्षा विभाग के निर्देशों पर चलते हुए आर.टी.ई. के स्टूडेंट्स को मुफ्त शिक्षा देने का कार्य किया है। जिसके बदले मे सरकार के द्वारा निजी विद्यालयों को रकम मुहैया कराने का प्रावधान है।
पिछले छह वर्षों से RTE का पैसा निजी विद्यालयों को आवंटित नहीं किए गए हैं।
कोरोनावायरस काल से जूझ रहे निजी विद्यालयों की आर्थिक स्थिति आज जर्जर हो चुकी है। निजी विद्यालयों के ऊपर कर्मचारियों के वेतन, बैंकों के किस्त, भवन का किराया, परिवहन का टैक्स, बिजली का बिल इत्यादि कई प्रकार की आर्थिक जिम्मेदारी होती है। ऐसे में सरकार से RTE के पैसों की मांग लाजमी है। बिहार पब्लिक स्कूल एंड चिल्ड्रेन वेलफेयर एसोसिएशन ने आरटीई के बकाया पैसों की मांग केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार के समक्ष कई बार रखा है। परन्तु सरकार के तरफ से इस मांग पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई। अब चुकी आर्थिक संकट निजी विद्यालयों के लिए बहुत बड़ी समस्या हो गई है, आरटीई का पैसा निजी विद्यालयों के लिए जीवनदान हो सकता है। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. डी. के. सिंह ने कहा कि लंबे समय से RTE के बकाया पैसों की मांग की जा रही है, अभी 2 दिनों के अंदर सरकार को इस पर विचार करना होगा,अन्यथा संगठन के द्वारा पूरे बिहार में इस मांग को आंदोलन का रूप दिया जाएगा। डॉ. सिंह ने कहा कि बिहार के 38 जिलों के जिलाध्यक्षों से बात करने के पश्चात संगठन इस फैसले तक पहुंची है कि अगर 2 दिनों के अंदर सरकार आर. टी. ई. के पैसों को लेकर कोई विचार नहीं करती है, तो पूरे बिहार में इसके लिए आंदोलन किए जाएंगे लॉकडाउन को देखते हुए हर जिले में जिलाध्यक्षों के नेतृत्व में एक दिवसीय अनशन का आयोजन किया जाएगा। अगर इससे भी बात नहीं बनी तो संगठन इस पर बड़े कदम उठाने को मजबूर हो जाएगी।
उपाध्यक्ष डॉ. एस. एम. सोहेल ने सरकार से अपील करते हुए कहा कि निजी विद्यालयों के साथ सहानुभूति के साथ पेश आए, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की साख निजी विद्यालयों ने ही बचा रखा है। अब अगर निजी विद्यालयों को ऐसे परेशान करेगी सरकार तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का आधार क्या रह जाएगा।
संगठन के संयुक्त सचिव प्रेम रंजन ने कहा कि इस समय RTE के पैसों की नितांत आवश्यकता निजी विद्यालयों को है। कई मांग करने के वाबजूद सरकार इस पर चुप्पी साधे बैठी है। आंदोलन के लिए संगठन को बाध्य किया जा रहा है।