कोलकाता/पटना: भारतीय राजनीति के ‘आधुनिक चाणक्य’ कहे जाने वाले अमित शाह के बारे में एक बात मशहूर है— वे चुनाव सिर्फ लड़ते नहीं हैं, वे उसे बहुत पहले ही ‘जीतना’ शुरू कर देते हैं। भाजपा के ‘मिशन ईस्ट’ की सफलता की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। बिहार में लालू और बंगाल में ममता बनर्जी के अभेद्य दुर्ग को भेदने के लिए शाह ने जिस ‘ऑपरेशन ईस्ट’ का खाका खींचा, उसके दो सबसे बड़े स्तंभ बनकर उभरे: सम्राट चौधरी और सुवेंदु अधिकारी। आइए समझते हैं कि शाह ने इस दोनों किले को कैसे ढाहा?
क्षेत्रीय क्षत्रपों को उन्हीं के हथियार से मात
अमित शाह यह बखूबी जानते थे कि बिहार और बंगाल जैसे राज्यों में केवल ‘मोदी लहर’ के भरोसे किलों को फतह नहीं किया जा सकता। यहां की राजनीति जमीन से जुड़ी है, जहां स्थानीय चेहरों और जातीय समीकरणों का बोलबाला है। शाह की रणनीति साफ थी—इन क्षेत्रीय पार्टियों के भीतर से ही ऐसे ‘सिपहसालार’ तैयार करना, जो अपने पूर्व आकाओं की रग-रग से वाकिफ हों।
बिहार: सम्राट चौधरी और ‘पगड़ी’ का दांव
बिहार में तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार के गठबंधन ने भाजपा के सामने एक बड़ी दीवार खड़ी कर दी थी। शाह ने यहां सम्राट चौधरी पर दांव लगाया। सम्राट न केवल एक पिछड़ी जाति (कोइरी-कुशवाहा) से आते हैं, बल्कि वे राजद और जदयू दोनों के भीतर की कार्यप्रणाली को जानते हैं।
अमित शाह ने सम्राट को पूरी छूट दी। सम्राट चौधरी ने जब नीतीश कुमार के खिलाफ अपनी ‘पगड़ी’ को मुद्दा बनाया, तो वह सिर्फ एक व्यक्तिगत कसम नहीं थी, बल्कि भाजपा की तरफ से बिहार के पिछड़े और अति-पिछड़े वोटों को अपनी ओर खींचने की एक सोची-समझी रणनीति थी। शाह ने सम्राट के जरिए यह संदेश दिया कि अब बिहार में भाजपा किसी के पीछे नहीं चलेगी, बल्कि खुद लीड करेगी।
बंगाल: सुवेंदु अधिकारी और ‘नंदीग्राम’ का मास्टरस्ट्रोक
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को चुनौती देना सबसे कठिन काम माना जाता था। यहाँ अमित शाह ने सुवेंदु अधिकारी को चुना—वो नेता जिसने नंदीग्राम आंदोलन के जरिए ममता को सत्ता तक पहुँचाया था। शाह ने सुवेंदु को भाजपा में शामिल कराकर टीएमसी के उस ‘अजेय’ होने के भ्रम को तोड़ दिया।
नंदीग्राम में ममता बनर्जी को उनके ही घर में हराना अमित शाह की रणनीति का सबसे बड़ा ‘टर्निंग पॉइंट’ था। सुवेंदु ने शाह के मार्गदर्शन में बंगाल के भाजपा कार्यकर्ता को वह जुझारूपन दिया, जिसकी कमी लंबे समय से महसूस की जा रही थी।
अमित शाह के ‘ऑपरेशन ईस्ट’ के तीन मुख्य बिंदु रहे:
इनसाइडर नॉलेज: सम्राट और सुवेंदु के पास अपने विरोधियों के गुप्त रणनीतियों की जानकारी थी।
आक्रामकता: शाह ने दोनों नेताओं को फ्रंट फुट पर खेलने की आजादी दी, जिससे विपक्षी खेमा हमेशा रक्षात्मक (Defensive) रहा।
संगठन की ताकत: शाह ने बूथ स्तर तक पन्ना प्रमुखों की फौज खड़ी की, जिसने इन नेताओं के जमीन पर किए गए संघर्ष को वोटों में बदला।
नैरेटिव की लड़ाई: भावनात्मक बनाम प्रशासनिक
दोनों राज्यों में चुनावी विमर्श को भावनात्मक अपील से हटाकर प्रशासनिक क्षमता, इंफ्रास्ट्रक्चर, और स्थिरता पर केंद्रित करने की कोशिश दिखी। इससे मतदाताओं के सामने “कौन बेहतर शासन दे सकता है” का सवाल प्रमुख बना।
