मुजफ्फरपुर (वेब डेस्क): बिहार के ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक खेती के साथ-साथ अब ‘ग्रीन एग्रो-बिजनेस’ (Green Agro-Business) का चलन तेजी से बढ़ रहा है। मुजफ्फरपुर और इसके आसपास के क्षेत्रों में युवाओं और किसानों को स्वरोजगार से जोड़ने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से ‘सुमित्रा जन कल्याण सेवा संस्थान’ द्वारा पूर्व में एक व्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया गया था। इस जमीनी पहल का असर अब यह हुआ है कि जिले के कई ग्रामीण परिवार जैविक उत्पादों के जरिए न सिर्फ अपनी खेती को समृद्ध कर रहे हैं, बल्कि नियमित आय भी अर्जित कर रहे हैं।
केमिकल मुक्त खेती और लागत कम करने पर था फोकस
संस्थान द्वारा आयोजित इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत ग्रामीण युवाओं, महिलाओं और सक्रिय किसानों को केंचुआ खाद (वर्मी कम्पोस्ट – Vermicompost), जैविक कीटनाशक (Organic Pesticides) और नीम आधारित विभिन्न कृषि उत्पाद तैयार करने का गहन व्यावहारिक प्रशिक्षण (Practical Training) दिया गया था। संस्था के पदाधिकारियों के अनुसार, इस पूरे अभियान का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहे रासायनिक खादों और कीटनाशकों पर निर्भरता को कम करना था। इसके साथ ही, किसानों को आत्मनिर्भर बनाकर उनकी खेती की बढ़ती लागत को कम करना और पर्यावरण के अनुकूल टिकाऊ खेती (Sustainable Farming) को बढ़ावा देना था।
हुनर सीखकर ग्रामीणों ने शुरू किया खुद का बिजनेस
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि यह सिर्फ कागजों या क्लासरूम तक सीमित नहीं रहा। ट्रेनिंग पूरी करने के बाद कई उत्साही लाभार्थियों ने स्थानीय स्तर पर ही अपनी वर्मी कम्पोस्ट इकाइयां और जैविक उत्पाद निर्माण केंद्र शुरू कर दिए हैं। ग्रामीणों ने बताया कि पहले उन्हें बाजार से महंगे दामों पर रासायनिक खाद खरीदनी पड़ती थी, जिससे खेती की लागत बहुत अधिक आती थी और मिट्टी की उपजाऊ क्षमता भी घट रही थी। लेकिन अब वे खुद अपने घरों और खेतों में उच्च गुणवत्ता वाली केंचुआ खाद और नीम आधारित कीटनाशक तैयार कर रहे हैं। इन इको-फ्रेंडली उत्पादों की स्थानीय बाजारों और नजदीकी किसानों के बीच भारी मांग है, जिससे इन नए ग्रामीण उद्यमियों को घर बैठे ही बंपर कमाई का जरिया मिल गया है।
लाभार्थियों के जीवन में आया बड़ा बदलाव
प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले स्थानीय ग्रामीणों और किसानों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि सुमित्रा जन कल्याण सेवा संस्थान की इस पहल ने उनके सोचने और काम करने का तरीका पूरी तरह बदल दिया है। जैविक खेती की इन नई और वैज्ञानिक तकनीकों की सटीक जानकारी मिलने से फसलों की उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है। कई महिला लाभार्थियों ने कहा कि इस हुनर ने न केवल ग्रामीण समाज में उनका आत्मविश्वास बढ़ाया है, बल्कि उन्हें अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने और बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए आय में योगदान देने का एक बेहतरीन अवसर भी प्रदान किया है।
टिकाऊ खेती की ओर बढ़ते कदम
सुमित्रा जन कल्याण सेवा संस्थान के पदाधिकारियों का मानना है कि सीमित संसाधनों के बावजूद सामुदायिक एकजुटता (Community Mobilization) और ग्रामीणों के सहयोग से यह पूरा अभियान बेहद सफल रहा है। संस्था का यह दृढ़ विश्वास है कि ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक विकास तभी संभव है जब हर हाथ में हुनर हो। अतीत में चलाए गए ये प्रशिक्षण शिविर आज ग्रामीण युवाओं को पलायन से रोकने और उनके पैतृक गांवों में ही रोजगार सृजन करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हुए हैं।
