मुंबई, 18 मार्च 2026: भारत के सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में दक्षिणी राज्यों का योगदान सबसे अधिक बना हुआ है. वित्त वर्ष 2024-25 में इनका योगदान लगभग 31 फीसदी रहा, जो उत्तरी क्षेत्र (30 फीसदी) से थोड़ा अधिक है. यह जानकारी रूबिक्स डेटा साइंसेज की ताजा रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ द स्टेट्स; असेसिंग स्टेट लेवल परफॉर्मेंस: ड्राइविंग इंडियाज इकोनॉमिक ट्रांजिशन में सामने आई है. इस रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2014-15 से 2024-25 तक के एक दशक का विश्लेषण किया गया है. इसमें जीडीपी में योगदान, प्रति व्यक्ति आय, पूंजीगत व्यय (कैपेक्स), निर्यात, सामाजिक क्षेत्र पर खर्च, कर्ज के प्रवाह और पर्यटन सहित 10 प्रमुख आर्थिक संकेतकों के आधार पर राज्यों के प्रदर्शन का मूल्यांकन किया गया है.
दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में भारत की निरंतर प्रगति अब इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्यों के बीच वृद्धि कितनी मजबूत, टिकाऊ और संतुलित रहती है. रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण के चार राज्य तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राष्ट्रीय जीडीपी में योगदान देने वाले शीर्ष 10 राज्यों शामिल हैं. इनका संयुक्त हिस्सा वित्त वर्ष 2014-15 के 25 फीसदी से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 27 फीसदी हो गया है. इससे पता चलता है कि दक्षिणी राज्यों की आर्थिक भूमिका मजबूत हो रही है. ये राज्य वृद्धि के मामले में भी आगे रहे और दशक के दौरान औसत वृद्धि दर के आधार पर शीर्ष 10 राज्यों में शामिल रहे.
कर्नाटक ने 7.8 फीसदी की औसत वास्तविक वृद्धि दर (रियल ग्रोथ रेट) के साथ पहला स्थान हासिल किया. इसके बाद तेलंगाना (7.1 फीसदी), आंध्र प्रदेश (6.9 फीसदी) और तमिलनाडु (6.8 फीसदी) रहे. इस व्यापक वृद्धि से विनिर्माण, सेवा और प्रौद्योगिकी आधारित क्षेत्रों में मजबूत प्रदर्शन का पता चलता है.
रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र अब भी भारत की अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा योगदान देने वाला राज्य है. हालांकि इसका हिस्सा वित्त वर्ष 2014-15 के 15 फीसदी से कम होकर वित्त वर्ष 2024-25 में 13 फीसदी रह गया है. बड़े राज्यों में गुजरात सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में एक बनकर उभरा है. वित्त वर्ष 2014-15 से वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान इसने 7.9 फीसदी की औसत वास्तविक वृद्धि दर हासिल की है.
क्षेत्रीय स्तर पर भारत का पूंजीगत व्यय मुख्यतः उत्तर में केंद्रित है, जहां बड़े औद्योगिक और बुनियादी ढांचा आधारित राज्य निवेश के समग्र प्रवाह को आगे बढ़ा रहे हैं. उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात, इन तीन राज्यों में वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान देश के कुल पूंजीगत व्यय का लगभग 30 फीसदी हिस्सा गया. हालांकि शीर्ष 10 राज्यों में ही कुल पूंजीगत व्यय का लगभग 67 फीसदी फीसदी हिस्सा जा रहा है. इससे यह स्पष्ट होता है कि संतुलित विकास को बढ़ावा देने के लिए पिछड़े क्षेत्रों में सरकारी और निजी निवेश का व्यापक विस्तार जरूरी है. औद्योगिक कर्ज भी पश्चिम और उत्तर में केंद्रित रहा. इसमें इन दोनों क्षेत्रों का हिस्सा 34-34 फीसदी रहा. यानी देश के कुल औद्योगिक कर्ज का दो-तिहाई हिस्सा इन्हीं दो क्षेत्रों में गया.
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत के वस्तु निर्यात में गुजरात, महाराष्ट्र और तमिलनाडु का संयुक्त योगदान लगभग 61 फीसदी है. क्षेत्रीय स्तर पर वस्तु निर्यात अब भी पश्चिम और दक्षिण में अत्यधिक केंद्रित है. पश्चिम ने वित्त वर्ष 2017-18 और वित्त वर्ष 2024-25 दोनों में लगभग 48 फीसदी के साथ अपना दबदबा बनाए रखा है. वहीं दक्षिण की निर्यात में हिस्सेदारी इस दौरान लगभग 26 फीसदी से बढ़कर करीब 33 फीसदी हो गई है. इससे ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और इंजीनियरिंग उत्पाद जैसे क्षेत्रों में इसकी बढ़ती विनिर्माण निर्यात क्षमता की जानकारी मिलती है.
रूबिक्स डेटा साइंसेज के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी मोहन रामास्वामी ने कहा, ‘‘भारत की वृद्धि की कहानी मूल रूप से राज्यों के स्तर की कहानी है. यह दशक आधारित विश्लेषण बताता है कि हम ऐसे मोड़ पर हैं, जहां वृद्धि अपने पारंपरिक केंद्रों से आगे फैल रही है, लेकिन एकाग्रता (कंसनट्रेशन) का जोखिम अब भी बना हुआ है. उभरते राज्य निवेश की मौजूदा गति को टिकाऊ औद्योगिक क्षमता में कितने प्रभावी तरीके से बदलते हैं, यही भारत के विकास का अगला चरण निर्धारित करेगा.’’
प्रति व्यक्ति समृद्धि में भी दक्षिणी राज्य आगे
दक्षिण का नेतृत्व केवल कुल जीडीपी तक सीमित नहीं है. बड़े राज्यों में तेलंगाना (3.88 लाख रुपये), कर्नाटक (3.81 लाख रुपये) और तमिलनाडु (3.62 लाख रुपये) ने वित्त वर्ष 2024-25 में प्रति व्यक्ति शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद (एनएसडीपी) के मामले में सबसे ऊंचा स्तर दर्ज किया. ये महाराष्ट्र (3.09 लाख रुपये) और हरियाणा (3.53 लाख रुपये) जैसे राज्यों से आगे रहे. ये तीनों राज्य प्रति व्यक्ति एनएसडीपी की दशक के दौरान औसत वृद्धि दर के मामले में भी शीर्ष 10 में शामिल रहे. यह दर स्थिर कीमतों पर सालाना 6 फीसदी से अधिक रही. यह इस बात का प्रमाण है कि इन राज्यों की आर्थिक वृद्धि केवल जीडीपी के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वास्तविक रूप से निवासियों की समृद्धि में बदल रही है.
धीरे-धीरे बदल रहा है भारत में निवेश का भूगोल
भारत की स्थिर पूंजी (फिक्स्ड कैपिटल स्टॉक) अब भी पश्चिम में काफी हद तक केंद्रित है, जहां वित्त वर्ष 2023-24 में इसका हिस्सा 33 फीसदी रहा. हालांकि नए निवेश का रुझान एक अलग तस्वीर पेश करता है. ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन (जीएफसीएफ) के रुझान बताते हैं कि निवेश का भौगोलिक संतुलन धीरे-धीरे बदल रहा है. नए निवेश में गुजरात की प्रमुख हिस्सेदारी 31 फीसदी से घटकर 18 फीसदी हो गई है, जबकि तमिलनाडु, ओडिशा और उत्तर प्रदेश ने अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है. पूंजी की दक्षता के लिहाज से कर्नाटक और तेलंगाना ने वित्त वर्ष 2023-24 में निवेशित पूंजी के मुकाबले उत्पादक पूंजी का अनुपात (प्रोडक्टिव कैपिटल टू इन्वेस्टेड कैपिटल रेशियो) 100 फीसदी से अधिक दर्ज किया. यह तेज आर्थिक सक्रियता और निजी क्षेत्र की मजबूत भागीदारी का एक दुर्लभ संकेतक है. गुजरात और महाराष्ट्र अब भी भारत के औद्योगिक केंद्र बने हुए हैं, लेकिन पूंजी निर्माण की अगली लहर अन्य राज्यों में फैल रही है.
सामाजिक क्षेत्र की प्रतिबद्धता में पूर्वोत्तर सबसे आगे
एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष में यह सामने आया है कि पूर्वोत्तर क्षेत्र ने सभी क्षेत्रों में जीडीपी के अनुपात में सामाजिक क्षेत्र पर सबसे अधिक खर्च दर्ज किया है. यह वित्त वर्ष 2014-15 के लगभग 15.1 फीसदी से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 16.4 फीसदी हो गया है. मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश ने क्रमश: जीडीपी के 28.5 फीसदी और 25.3 फीसदी के साथ सामाजिक खर्च में अग्रणी स्थान हासिल किया. हालांकि पूर्वोत्तर की अर्थव्यवस्थाएं अपेक्षाकृत छोटी हैं, जिससे कुल खर्च की मात्रा सीमित रहती है, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण पर इनकी वित्तीय प्रतिबद्धता भारत में सबसे अधिक है, जिसे पीएम-डिवाइन (PM-DevINE) जैसी केंद्रीय योजनाओं का समर्थन मिला है. इसके विपरीत, अपने बड़े आर्थिक आकार के बावजूद दक्षिण और पश्चिम जीडीपी के अनुपात में सामाजिक क्षेत्र पर अपेक्षाकृत कम खर्च करते हैं. इससे पता चलता है कि विभिन्न क्षेत्रों की विकास की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं.
क्रेडिट मार्केट: खुदरा कर्ज में दक्षिण आगे, तेजी से फासला कम कर रहा पश्चिम
दक्षिण ने वित्त वर्ष 2024-25 में पर्सनल लोन में सबसे बड़ा हिस्सा (35 फीसदी) बनाए रखा. महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु इस मामले में शीर्ष राज्यों में शामिल रहे. हालांकि पश्चिम का हिस्सा 22 फीसदी से बढ़कर 27 फीसदी हो गया. इससे खुदरा कर्ज की तेज होती पहुंच का पता चलता है. औद्योगिक कर्ज के मामले में महाराष्ट्र ने वित्त वर्ष 2024-25 में 25 फीसदी हिस्सेदारी के साथ अग्रणी स्थान बनाए रखा. हालांकि अन्य राज्यों में क्रेडिट मार्केट के विस्तार के कारण इसका वर्चस्व धीरे-धीरे कम हो रहा है. पर्सनल लोन में शीर्ष 10 राज्यों ने मिलकर वित्त वर्ष 2024-25 में लगभग 72 फीसदी योगदान दिया. यह बताता है कि कर्ज के मामले में क्षेत्रवार आधार पर अधिक संतुलित नीतियों की आवश्यकता है.
पर्यटन: उत्तर का दबदबा, उत्तर प्रदेश का उभार स्पष्ट
भारत में 2024 के दौरान 2.09 करोड़ विदेशी पर्यटकों का आगमन हुआ. वहीं लगभग घरेलू पर्यटकों की 2.9 अरब यात्राएं दर्ज की गईं. दोनों ही श्रेणियों में उत्तर का दबदबा रहा. इसे विरासत (हेरिटेज)और धार्मिक स्थलों ने बढ़ावा दिया. उत्तर प्रदेश 22 फीसदी हिस्सेदारी के साथ घरेलू पर्यटन का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा, जिसे अयोध्या राम मंदिर के उद्घाटन से बढ़ावा मिला. 2025 में प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ मेले के बाद इसके और मजबूत होने की उम्मीद है, जिसमें 66 करोड़ से अधिक लोगों ने भाग लिया. विदेशी पर्यटकों के मामले में महाराष्ट्र 18 फीसदी हिस्सेदारी के साथ शीर्ष पर रहा, जबकि पश्चिम बंगाल का हिस्सा 2014 के 6 फीसदी से बढ़कर 2024 में 15 फीसदी हो गया. भारत में 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश हैं. इसके बावजूद, शीर्ष 10 राज्यों में घरेलू पर्यटन का लगभग 87 फीसदी और विदेशी पर्यटन का लगभग 89 फीसदी केंद्रित है. यह कम विकसित क्षेत्रों में पर्यटन की बड़ी संभावनाओं की ओर इशारा करता है.
पिछड़े से प्रतिस्पर्धी तक: बीमारू राज्यों का बदलाव
रिपोर्ट का एक प्रमुख पहलू बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे बीमारू राज्यों का परिवर्तन है. वित्त वर्ष 2014-15 से 2024-25 के बीच बिहार और मध्य प्रदेश की सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) लगभग तीन गुना हो गई, जबकि राजस्थान और उत्तर प्रदेश में यह लगभग 2.8 गुना बढ़ी. प्रति व्यक्ति एनएसडीपी भी इन चारों राज्यों में लगभग 2.5 गुना बढ़ी है. खास तौर पर उत्तर प्रदेश पूंजीगत व्यय और घरेलू पर्यटन में राष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी बनकर उभरा है, जबकि राजस्थान और मध्य प्रदेश निर्यात और क्रेडिट मार्केट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं. ये राज्य अब केवल बड़ी आबादी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अपने आप में महत्वपूर्ण आर्थिक योगदानकर्ता बनते जा रहे हैं.
निष्कर्ष: मुख्य आर्थिक केंद्रों से बाहर भी जमानी होंगी वृद्धि की जड़ें
रिपोर्ट का केंद्रीय निष्कर्ष यह है कि भारत का आर्थिक नक्शा बदल रहा है, लेकिन यह बदलाव असमान है. महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक और तेलंगाना अब भी उत्पादन, निवेश, निर्यात और क्रेडिट के प्रमुख आधार बने हुए हैं. वहीं उत्तर प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और असम जैसे राज्य वास्तविक गति के साथ अपनी आर्थिक उपस्थिति का विस्तार कर रहे हैं. हालांकि, प्रमुख संकेतकों में आर्थिक नेतृत्व अब भी कुछ ही राज्यों में अत्यधिक केंद्रित है, जिससे एक अंतर्निहित जोखिम पैदा होता है. जब वृद्धि सीमित क्षेत्रों में केंद्रित होती है, तो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था स्थानीय झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है. भारत की दीर्घकालिक आर्थिक मजबूती केवल अग्रणी राज्यों की निरंतर ताकत पर ही निर्भर नहीं करेगी, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगी कि उभरते क्षेत्र मौजूदा गति को कितने प्रभावी तरीके से टिकाऊ और आत्मनिर्भर विकास में बदलते हैं. भारत के विकास का अगले चरण केवल वृद्धि की गति से तय नहीं होगा, बल्कि आर्थिक और औद्योगिक आधार के भौगोलिक विस्तार से भी वह प्रभावित होगा.