पटना/कोलकाता: भारतीय राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि ‘वफादारी’ ही सत्ता की सीढ़ी है, लेकिन सम्राट चौधरी और सुवेंदु अधिकारी की कहानी इस परिभाषा को चुनौती देती है। ये उन दो ‘बागियों’ की दास्तां है, जिन्होंने अपनी पुरानी विरासत और सियासी घरों को छोड़ा, भगवा चोला ओढ़ा और आज अपने-अपने राज्यों के ‘बादशाह’ यानी मुख्यमंत्री बनकर उभरे हैं।
एक तरफ बिहार की जातिगत बिसात पर ‘पगड़ी’ की कसम खाने वाले सम्राट चौधरी हैं, तो दूसरी तरफ नंदीग्राम के संग्राम में ‘दीदी’ के किले में सेंध लगाने वाले सुवेंदु अधिकारी। दोनों में समानता सिर्फ यह नहीं कि वे भाजपा के ‘पोस्टर बॉय’ हैं, बल्कि यह भी है कि दोनों ने अपने पूर्व राजनीतिक आकाओं की कमजोरियों को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया। पूरब की सियासत के इन दो धुरंधरों का उदय महज एक संयोग है या भाजपा की उस ‘लॉन्ग टर्म’ प्लानिंग का हिस्सा, जिसने क्षेत्रीय क्षत्रपों के दौर को खत्म कर एक नए नेतृत्व की नींव रखी है? आइए जानते हैं, कैसे इन दो नेताओं ने अपने ‘विद्रोही तेवरों’ को राजतिलक में बदल दिया।”
1. समानताएं: एक ही सांचे में ढले दो नेता
दोनों नेताओं के उदय की कहानी में गजब की समानताएं हैं—
विरासत की राजनीति: दोनों ही राजनीतिक परिवारों से आते हैं। सुवेंदु अधिकारी के पिता शिशिर अधिकारी कद्दावर नेता रहे हैं, वहीं सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी बिहार की राजनीति का बड़ा नाम रहे हैं।
दलबदल और भाजपा में उदय: दोनों ही नेता दूसरी पार्टियों (सुवेंदु- TMC, सम्राट- RJD/JDU) से भाजपा में आए। खास बात यह है कि भाजपा ने इन दोनों को ‘बाहरी’ होने के बावजूद बहुत जल्द स्वीकार किया और बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी।
आक्रामक शैली: दोनों अपनी बेबाक और तीखी बयानबाजी के लिए जाने जाते हैं। सुवेंदु सीधे ममता बनर्जी को ‘पीशी’ (बुआ) कहकर चुनौती देते हैं, तो सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार के खिलाफ अपनी ‘पगड़ी’ को ही राजनीति का केंद्र बना दिया था।
जमीनी पकड़: दोनों नेताओं का अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों (सुवेंदु का नंदीग्राम/मेदिनीपुर और सम्राट का मुंगेर/खगड़िया क्षेत्र) में जबरदस्त वोट बैंक है।
जहां अलग हो जाती है कहानी (अंतर)
| पहलू | सम्राट चौधरी (बिहार) | सुवेंदु अधिकारी (प. बंगाल) |
|---|---|---|
| राजनीतिक पृष्ठभूमि | बिहार की जातीय-क्षेत्रीय राजनीति से उभार | पूर्वी मेदिनीपुर की क्षेत्रीय पकड़, बाद में राज्यव्यापी विस्तार |
| उभार का संदर्भ | गठबंधन समीकरणों और संगठन सुदृढ़ीकरण के बीच नेतृत्व | सत्तारूढ़ दल छोड़कर विपक्ष को धार देने के बाद तेज़ उभार |
| प्रमुख नैरेटिव | सामाजिक संतुलन + विकास + संगठन | सशक्त विपक्ष + वैचारिक ध्रुवीकरण + क्षेत्रीय प्रभाव |
| शैली | संगठनधर्मी, संतुलित सार्वजनिक भाषा | तीखा, सीधे टकराव वाली राजनीतिक शैली |
