डॉ. मनीषा यादव
बाल रोग विशेषज्ञ
कंसलटेंट, इंडियन स्पाइनल इंजूरी सेंटर
कोरोना महामारी ने देश की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की खामियों के साथ स्वास्थ्य कर्मियों के खतरों को उजागर करने का काम किया है।कोरोना महमारी के बीच जान जोखिम में डालकर लड़ रहे स्वास्थ्य कर्मियों पर लगातार हो रहे हमलों ने उनका मनोबल और जोश को तोड़ने का काम किया है। इस संकट के समय में हम सभी को डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को लेकर संवेदनशीलता, भावुक और सहानुभूति बढ़ाने की जरूरत है लेकिन हालात ठीक इसके विपरीत हो रहे हैं।
स्वास्थ्य कर्मियों पर हो रहे हमले किसी क्षेत्र या समुदाय तक सीमित नहीं है। वह धीरे-धीरे दिल्ली, इंदौर, चेन्नई से लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश के शहरों को अपने घेरे में ले लिया है। अब सवाल उठता है कि स्वास्थ्य कर्मियों पर हमले करोने को कहां से उकसावा मिल रहा है? डॉक्टरों के खिलाफ हो रहे हिंसा को रोकने के लिए क्या किया जा सकता है? मैं मानती हूं कि सबसे पहले, कानून का बेहतर कार्यान्वयन होना चाहिए। मेडिकल प्रोटेक्शन एक्ट में भी इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया गया है। वहीं, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और न ही आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) में इस गंभीर मामले को लेकर तस्वीर साफ है जिससे पीड़ित चिकित्सकों के लिए शिकायत दर्ज करना मुश्किल हो रहा है। हालांकि, इस महामारी के बीच डॉक्टरों पर हमले को रोकने के लिए द इपिडेमिक डिसीज (अमेंडमेंट) ऑर्डिनेंस 2020 लया गया है जो हमला करने वाले को 7 साल तक की जेल और 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाने का प्रावधान किया गया है।
डॉक्टरों की नियुक्ति प्रतिक्रिया तेज करने की जरूरत
इस महामारी के बाद भी इस द इपिडेमिक डिसीज (अमेंडमेंट) ऑर्डिनेंस कानून का प्रभावी कार्यान्वयन होना चाहिए। साथ ही डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए एक सुरक्षा टीम का गठन होना चाहिए। इसके साथ ही 1400 रोगियों के लिए 1 डॉक्टर का अनुपात बेहद निराशाजनक है। अधिक डॉक्टरों की भर्ती से डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा में कमी आ सकती है क्योंकि मरीज कम चिंतित महसूस करेंगे। इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य कर्मियों के दृष्टिकोण से, युवा डॉक्टरों को मरीजों से संबंध बेहतर बनाने देना चाहिए। युवा डॉक्टरों को बेहतर पारस्परिक संबंध विकसित करने और रोगियों और उनके रिश्तेदारों को इलाज की प्रक्रियाओं को सही तरीके से समझाने के लिए भी प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इस बात पर जोर देना चाहिए कि दुःखी रिश्तेदारों से कैसे सामना करना है क्योंकि कभी भी चिकित्सकों पर हमले के लिए दुखी रिश्तेदार उकसावा नहीं देते हैं।
प्रणालीगत बदलाव लाना अनिवार्य
अंत में, स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए एक प्रणालीगत बदलाव लाना अनिवार्य है। यह परिवर्तन केवल प्रशासन, स्वास्थ्य पेशेवर और जनता के साथ बातचीत शुरू करके ही किया जा सकता है। इस महामारी में डॉक्टरों के खिलाफ भीड़ की हिंसा को इस तरह के आंदोलन की शुरुआत के रूप में लिया जाना चाहिए। ऐसा करने से हमें बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी कि लोग इस महामारी से बचने के लिए टेस्ट के परिणामों के बारे में जानते हैं फिर वो क्यों भीड़ का हिस्सा बनकर हिंस करने पर ऊतारू हो जाते हैं। हालांकि, यह समझ केवल संवाद के जरिए ही हासिल की जा सकती है। स्वास्थ्य सेवा पेशेवर के खिलाफ हिंसा रोकने में तभी मदद मिलेगी जब सरकार, स्वास्थ्य विभाग और जनता एक साथ मिलकर काम करेंगे।