पटना/मुजफ्फरपुर/दरभंगा: नए सत्र की शुरुआत के साथ ही बिहार के कई शहरों में अभिभावकों और छात्रों की परेशानी बढ़ गई है। स्कूल किताबों की मनमानी कीमत वसूल रहे हैं। अब अभिभावकों को सोशल मीडिया पर गुहार लगाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। कई अभिभावक बताते हैं कि उन्हें एक फिक्स दुकानों से ही किताबें लेने को कहा जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में किताबों की कीमतों में जो उछाल आया है, वह किसी भी तर्क से परे है। एनसीईआरटी (NCERT) की जो किताबें चंद रुपयों में आती थीं, उन्हें दरकिनार कर निजी प्रकाशकों (Private Publishers) की महंगी किताबों का एक ऐसा जाल बुना गया है जिसमें माता-पिता फँसते जा रहे हैं। एक साधारण कक्षा के बच्चे का बुक-सेट अब 5,000 से 10,000 रुपये के बीच पहुँच गया है। जब बाजार में विकल्प ही न बचे हों, तो खरीदार की मजबूरी का फायदा उठाना आसान हो जाता है। ज्ञान गंगा जैसी बड़ी संस्थाओं का दबदबा इतना बढ़ गया है कि छोटे पुस्तक विक्रेता या तो खत्म हो रहे हैं या उनके कमीशन के खेल में दब गए हैं।
शिक्षा या संगठित व्यापार?
यह सिर्फ एक दुकान की कहानी नहीं है, बल्कि स्कूलों और डिस्ट्रीब्यूटर्स के बीच उस ‘नेक्सस’ की कहानी है जो कमीशन के चक्कर में हर साल सिलेबस बदल देते हैं। अभिभावकों का आरोप है कि किताबों पर लिखे एमआरपी (MRP) और उनकी वास्तविक लागत में जमीन-आसमान का अंतर है। बिहार का वह युवा जो पहले ही बेरोजगारी और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है, उसके लिए ज्ञान का यह ‘गंगा’ अब भारी पड़ रहा है।
ऐसे में बिहार की गलियों में एक कहावत मशहूर है—”पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब।” लेकिन आज के दौर में बिहार के मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह ‘नवाब’ बनने का सपना ‘कंगाल’ होने की राह पर खड़ा है। इसका सबसे बड़ा कारण है शिक्षा के बाजार में पनपती ‘मोनोपोली’ (एकाधिकार)।
आवाज उठाना जरूरी
शिक्षा का उद्देश्य समाज को अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाना है, न कि किसी की तिजोरी को अंधाधुंध भरना। अगर आज आवाज नहीं उठाई गई, तो बिहार का मेधावी छात्र किताबों के अभाव में दम तोड़ देगा। कलम की ताकत किसी के एकाधिकार की गुलाम नहीं हो सकती।