पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह की रिहाई मांग हुई तेज हो गई है। पूरे सारण प्रमंडल ही नहीं बल्कि समूचे बिहार में पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह की रिहाई को लेकर बड़ा जन आंदोलन चल रहा है। गांव से लेकर कस्बों और शहर तक प्रभुनाथ सिंह के चाहने वाले उनकी रिहाई की मांग नीतीश सरकार से कर रहे हैं। आनंद मोहन और अनंत सिंह की रिहाई के बाद प्रभुनाथ सिंह की रिहाई की मांग तेज हो गई है। इस जन आंदोलन में आम से खास तक जुड़ता जा रहा है। सोशल मीडिया पर भी #प्रभूनाथ_सिंह_को_रिहा_करो ट्रेंड कर रहा है। राजनीतिक गरियारे में प्रभुनाथ सिंह की रिहाई को लेकर हलचल तेज हो गई है। विभिन्न सामाजिक संगठनों, समर्थकों और क्षेत्रीय नेताओं ने इस मुद्दे को लेकर आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी है।
विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है असर
इस घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा को जन्म दे दिया है। कुछ क्षेत्रीय दलों ने संकेत दिए हैं कि यदि प्रभुनाथ सिंह को रिहा किया जाता है तो इससे आगामी विधानसभा चुनावों में समीकरण बदल सकते हैं। उनके प्रभाव क्षेत्र में अब भी उनका राजनीतिक दबदबा बना हुआ है। समर्थकों का कहना है कि यदि रिहाई की मांग को नजरअंदाज किया गया तो वे प्रदेशव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे। कुछ संगठनों ने इस मुद्दे को लेकर दिल्ली तक मार्च निकालने की भी योजना बनाई है। प्रभुनाथ सिंह की रिहाई की यह मांग ना सिर्फ कानूनी मोर्चे पर, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी एक बड़ी बहस का विषय बनती जा रही है।
कमजोर लोगों की जुबान हैं प्रभुनाथ सिंह
प्रभुनाथ सिंह की छवि एक दबंग और गरीबों के मसीहा नेता के रूप में रही है। उनको समर्थकों का कहना है कि सालों से जेल में बंद प्रभुनाथ सिंह को साजिश में फंसाकर जेल भेजा गया है। वो कमजोर लोगों की जुबान थे। इसी का खामियाजा उन्हें उठाना पड़ा है। पूर्व सांसद के समर्थक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लगातार संपर्क कर उनकी रिहाई के तर्ज पर रिहा करने की मांग कर रहे हैं। सर्मथकों का कहना है कि नेता जी की रिहाई विधानसभा चुनाव के पहले चाहते हैं।
प्रभुनाथ सिंह के प्रति दिवानगी क्यों?
एक आम परिवार से निकलकर प्रभुनाथ सिंह 4 बार सांसद और दो बार विधायक बने। नेता जी को विरासत में कुछ नहीं मिला। जो कुछ उन्होंने पाया वो अपनी कर्मठता के चलते पाया। 1985 का विधानसभा चुनाव उन्होंने निर्दलीय जीता था। उसमें सबसे बड़ी भूमिका मशरक विधानसभा के गरीब गुरबों एवं वंचित समाज का था। इसलिए उन पर जातीय विशेष का नेता होने का ठप्पा नहीं लगता। 1998 से लेकर 2009 तक नीतीश जी के साथ मजबूती से खड़े रहे।
किस मामले में जेल में बंद
साल 1995 में बिहार विधानसभा चुनावों के लिए 25 मार्च को सारण ज़िले की मशरख सीट पर मतदान हो रहा था। इसमें मुख्य मुक़ाबला जनता दल के उम्मीदवार अशोक सिंह और बिपीपा के उम्मीदवार प्रभुनाथ सिंह के बीच था। आरोपों के मुताबिक़, वोटिंग के दिन प्रभुनाथ सिंह अपने कार्यकर्ताओं के साथ पानापुर प्रखंड के धेनुकी इलाके से गुज़र रहे थे और तभी दूसरे प्रत्याशी को वोट देकर लौट रहे कुछ युवकों पर गोली चली थी। इसमें दो लोगों की मौत हो गई थी। इसी मर्डर केस में प्रभुनाथ सिंह जेल में सजा काट रहे हैं।
आखिर कौन हैं प्रभुनाथ सिंह: एक परिचय
जन्म और प्रारंभिक जीवन: प्रभुनाथ सिंह का जन्म 20 नवंबर 1953 को बिहार के मशरख, छपरा में हुआ था।
राजनीतिक सफर: उन्होंने 1985–1995 तक मशरख विधानसभा चुनाव (MLA) हराया, पहले निर्दलीय और फिर जनता दल (JD) के टिकट पर। बाद में वह 1998–2009 तक महाराजगंज लोकसभा क्षेत्र से सांसद रहे — दो बार JD(U) और एक बार Samata पार्टी से। 2013–2014 में RJD टिकट पर उपचुनाव के माध्यम से फिर सांसद चुने गए।
दबंग नेता की छवि: उन्हें बिहार में “दबंग” या बाहुबली नेता के रूप में जाना जाता था। लेकिन इसके साथ वो गरीबों के मसीहा भी थे। गरीबों को मदद करना उनके नेचर में था। वर्तमान समय में वे हज़ारीबाग जेल में सजा काट रहे हैं