पटना, 17 अक्टूबर। बिहार में कचरे को कमाई और रोजगार का जरिया बनाने की एक अनूठी मिसाल सामने आई है। राजधानी पटना के खुशरूपुर प्रखंड की अलावलपुर पंचायत में थर्मोकोल अपशिष्ट से दाने तैयार किए जा रहे हैं। पर्यावरण के लिए चुनौती माने जाने वाले इस कचरे का वैज्ञानिक तरीके से पुनर्चक्रण कर उपयोगी उत्पाद बनाया जा रहा है। इस पहल से न केवल कचरे के निस्तारण की समस्या का समाधान हुआ है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और कारोबार के अवसर भी पैदा हुए हैं।
लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान (एलएसबीए) और स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत विकसित यह मॉडल अब बिहार से बाहर भी अपनी पहचान बना रहा है। अलावलपुर की इकाई थर्मोकोल अपशिष्ट से दाने तैयार कर रही है, जिनका इस्तेमाल नई थर्मोकोल शीट बनाने में किया जाता है। इस कारोबार का नेटवर्क उत्तर प्रदेश और झारखंड तक फैल चुका है।
कचरे के निस्तारण की समस्या से निकला कारोबार का रास्ता
ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, पहले थर्मोकोल अपशिष्ट का कोई खरीदार नहीं मिलता था। हल्का होने के बावजूद यह कचरा अधिक जगह घेरता था, जिससे अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाइयों में इसके भंडारण और निस्तारण में परेशानी होती थी।
इस समस्या के समाधान के लिए स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) की प्रखंड क्रियान्वयन समिति ने स्थानीय कबाड़ व्यवसायी ब्रदर प्लास्टिक्स को थर्मोकोल कचरे के संग्रहण और पुनर्चक्रण के लिए प्रोत्साहित किया। इसके बाद इस अपशिष्ट को उपयोगी उत्पाद में बदलने की प्रक्रिया शुरू हुई।
2017 में शुरुआत, 2023 से आधुनिक मशीनों से उत्पादन
ब्रदर प्लास्टिक्स के संचालक दीपक कुमार ने वर्ष 2017 में कचरा केंद्रों से थर्मोकोल खरीदकर उससे लम्प्स यानी ठोस टुकड़े तैयार करने का काम शुरू किया। तकनीक में लगातार सुधार के बाद वर्ष 2023 से आधुनिक मशीनों की मदद से इन टुकड़ों से सीधे थर्मोकोल के दाने (ग्रैन्यूल्स) तैयार किए जाने लगे।
आज यह इकाई पटना के आठ, रांची के दो और बनारस के एक कबाड़ी से थर्मोकोल अपशिष्ट खरीदती है। इससे कचरे के संग्रहण से लेकर उसके पुनर्चक्रण तक एक कारोबारी नेटवर्क विकसित हुआ है।
ऐसे तैयार होते हैं थर्मोकोल के दाने
दीपक कुमार के मुताबिक, सबसे पहले थर्मोकोल अपशिष्ट को छोटे टुकड़ों में तोड़कर पिघलाया जाता है। इससे ठोस लम्प्स तैयार होते हैं। इसके बाद ग्राइंडिंग मशीन से इन्हें पीसकर पाउडर बनाया जाता है और जरूरत के अनुसार इसमें रसायन मिलाए जाते हैं।
अगले चरण में एक्सट्रूडर मशीन की मदद से इस मिश्रण को मोटे रेशों का आकार दिया जाता है। फिर इन रेशों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर दाने तैयार किए जाते हैं। इन दानों का इस्तेमाल दोबारा थर्मोकोल शीट जैसे उत्पाद बनाने में किया जाता है।
हर महीने 17.5 लाख रुपये के उत्पादन का बाजार मूल्य
अलावलपुर स्थित इस इकाई में फिलहाल हर महीने करीब 40 से 50 टन थर्मोकोल दानों का उत्पादन हो रहा है। औसतन 35,000 रुपये प्रति टन की दर से देखें तो 50 टन उत्पादन का बाजार मूल्य करीब 17.50 लाख रुपये प्रति माह होता है। 40 टन उत्पादन पर यह मूल्य लगभग 14 लाख रुपये बैठता है।
इस तरह इकाई का मासिक उत्पादन मूल्य करीब 14 लाख से 17.50 लाख रुपये के बीच है। यह आंकड़ा उत्पादन के बाजार मूल्य को दर्शाता है, न कि शुद्ध मुनाफे को। इस पूरी प्रक्रिया में स्थानीय स्तर पर 12 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार भी मिला है।
बिहार में बढ़ रहा है वेस्ट टू वेल्थ का दायरा
ग्रामीण विकास विभाग के अनुसार, अलावलपुर का यह मॉडल दिखाता है कि उचित तकनीक, स्थानीय उद्यमियों की भागीदारी और बाजार से जुड़ाव के जरिए कचरे को उपयोगी संसाधन में बदला जा सकता है। इससे अपशिष्ट प्रबंधन की चुनौती के साथ-साथ रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में भी मदद मिलती है।
ग्रामीण विकास विभाग और सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण काम किए जा रहे हैं। सिंगल यूज प्लास्टिक से बेंच बनाने के अलावा प्लास्टिक कचरे से पेवर ब्लॉक, सजावटी सामग्री, गमले, खिलौने और इंटरलॉकिंग टाइल्स तैयार की जा रही हैं। सड़क निर्माण में भी प्लास्टिक अपशिष्ट का उपयोग किया जा रहा है।
मंत्री श्रवण कुमार के मुताबिक, राज्य में थर्मोकोल अपशिष्ट से दाने तैयार कर उसके पुनर्चक्रण को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। विभाग के समन्वित प्रयासों और उद्यमों के सहयोग से बिहार कचरे को संसाधन और संपदा में बदलने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसे नवाचार वेस्ट टू वेल्थ और सर्कुलर इकोनॉमी की अवधारणा को जमीन पर उतारने के साथ-साथ प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में बिहार की भूमिका को मजबूत कर रहे हैं।
