Prashant Kishor News: प्रशांत किशोर यानी PK, जब पहली बार राज्य के गांव-गांव में जाकर लोगों से मिल रहे थे तो यही लगा था कि वे बिहार की जनता को वैकल्पिक राजनीति का विकल्प देने चले हैं। लेकिन आज वो जिस तरह की हरबराहट में लग रहे हैं, उससे तो कुछ अलग ही संकेत मिल रहे हैं। एक के बाद एक BJP-JDU समेत तमाम दलों के छोटे-बड़े नेता जन सुराज में लगातार शामिल हो रहे हैं। इसके बाद यह चर्चा जोरों पर हैं कि कहीं, वो भी अरविंद केजरीवाल की रास्ते पर तो नहीं निकल चले हैं। अरविंद केजरीवाल भी दिल्ली की जनता को वैकल्पिक राजनीति का विकल्प देने आए थे लेकिन बाद में क्या हुआ यह किसी से छुपा नहीं है। वैसे पीके देश की राजनीति में एक चतुर रणनीतिकार के रूप में जाने जाते हैं। हालांकि, वे जिस तरह से हर राजनीतिक दल BJP, JDU, RJD, कांग्रेस से पूर्व नेताओं, कार्यकर्ताओं और प्रभावशाली चेहरों को अपने साथ जोड़ रहे हैं, उससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर उनको इतनी जल्दी किस बात की है?
PK की हड़बड़ी के पीछे के कारण
राजनीति विश्लेषकों का मनना है कि PK की हड़बड़ी के पीछे कई कारण है। वह किसी भी सूरत में बिहार की सत्ता में अपनी हिस्सेदारी पहली बार में ही सुनिश्चत करना चाहते हैं। हालांकि, उनके पास समय की कमी है। अगर उन्हें राजनीतिक रूप से प्रासंगिक और प्रभावशाली ताकत के रूप में उभरना है, तो उनके पास ज्यादा समय नहीं है। इस बात को वो भली-भांति समझ रहे हैं।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि PK ने जिस तरह से सभी दलों के नेताओं को अपने पाले में खींचना शुरू किया है, वह पारंपरिक राजनीति से बिल्कुल उलट है। वे यह कहकर इन नेताओं को जगह दे रहे हैं कि अगर कोई अच्छा काम करना चाहता है और पुराने सिस्टम से तंग है, तो हमारे साथ आए। लेकिन आलोचकों का सवाल यह है कि जो लोग दशकों तक सत्ता में रहे, भ्रष्टाचार या विफलताओं के हिस्सेदार रहे, वे अब अचानक बदलाव कैसे करेंगे?
क्या मुख्यमंत्री बनने की जल्दबाजी है?
कई विश्लेषकों का मनना है कि प्रशांत किशोर जल्द से जल्द मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। वो एक समय वर्तमान बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राइट हैंड रहे हैं। ऐसे में वो एक विधायक या मंत्री से खुश नहीं होंगे। वो सीधे मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। ये सारी कवायद उसी दिशा में लग रही है। इसलिए अभी से पार्टी में असंतोष की लहर तेज हो गई है। कई नेता पार्टी बनने के कुछ दिन बाद ही पार्टी से अलग हो रहे हैं।
वैसे प्रशांत किशोर वैकल्पिक मुख्यमंत्री चेहरा बनाने से फिलहाल वे इनकार करते हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि उनका हर कदम इसी दिशा में जा रहा है। चाहे वह युवाओं को प्रशिक्षित करना हो या पंचायत स्तर पर संगठन खड़ा करना — यह किसी साधारण आंदोलन से ज्यादा एक ठोस राजनीतिक तैयारी का संकेत देता है।
जनता-जनार्दन के हाथों में भविष्य
अब तो अगामी बिहार चुनाव में बिहार की जनता ही तय करेगी वो प्रशांत किशोर की हरबराहट को कितना सिरयसली ले रही है। अगर उनकी पार्टी विधानसभा चुनाव में अच्छा कर जाती है और वे “जन सुराज” को एक वैकल्पिक राजनीतिक मंच में बदल पाते हैं, तो यह बिहार की राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है। लेकिन अगर यह अभियान केवल पुराने नेताओं का नया ठिकाना बनकर रह गया, तो यह भी एक और असफल प्रयोग बन जाएगा — जैसा कि बिहार ने पहले भी कई बार देखा है।







