नोएडा/गुरुग्राम: अगर आप दिल्ली-एनसीआर में अपने सपनों का घर ढूंढ रहे हैं, तो रुकिए और सावधान हो जाइए! रियल्टी मार्केट में इन दिनों एक ऐसा संगठित ‘कॉपोरेट सिंडिकेट’ सक्रिय है, जो न सिर्फ बिल्डरों की रीढ़ तोड़ रहा है, बल्कि आम होम बायर्स की जेब पर भी डाका डाल रहा है। नए प्रोजेक्ट्स की कम लॉन्चिंग का फायदा उठाकर कुछ प्रॉपर्टी ब्रोकर्स और कथित इन्वेस्टर सिंडिकेट ने ब्लैकमेलिंग का यह नया धंधा शुरू किया है। नोएडा, ग्रेटर नोएडा, नोएडा एक्सप्रेसवे, गुरुग्राम से लेकर भिवाड़ी और पानीपत तक के बड़े रियल्टी हब्स में 5 से 10 ब्रोकर्स के गुट मिलकर इस खेल को बेखौफ अंजाम दे रहे हैं।
इस तरह रियल एस्टेट में चल रहा बदनामी का खेल
रियल एस्टेट सेक्टर से जुड़े लोगों के मुताबिक, इस कथित मॉडल में शुरुआत सामूहिक बुकिंग से होती है। 5 से 10 ब्रोकर या उनसे जुड़े लोग एक ही प्रोजेक्ट में 10 से 15 फ्लैट बुक करते हैं। शुरुआत में यह सामान्य ग्रुप बुकिंग या निवेश की रणनीति जैसी दिखाई देती है। लेकिन बुकिंग के बाद कथित तौर पर रणनीति बदल जाती है।
फ्लैट या प्रोजेक्ट में छोटी-बड़ी कमियां निकाली जाती हैं। कंस्ट्रक्शन क्वालिटी, फिनिशिंग, प्रोजेक्ट में देरी, सुविधाओं या तकनीकी खामियों को लेकर सवाल उठाए जाते हैं। इसके बाद बिल्डर से कीमत कम करने की मांग की जाती है। आरोप है कि कुछ मामलों में प्रति फ्लैट 20 से 25 लाख रुपये तक की कीमत कम कराने का दबाव बनाया जाता है।
सोशल मीडिया बना दबाव बनाने का हथियार
प्रॉपर्टी माफिया बिल्डर पर दबाब बनाने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल जमकर करते हैं। रियल एस्टेट सेक्टर से जुड़े लोगों का कहना है कि ये लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल वास्तविक शिकायत दर्ज कराने के बजाय बिल्डर पर आर्थिक दबाव बनाने के लिए कर रहे हैं। पहले कीमत कम करने की मांग की जाती है और मांग पूरी नहीं होने पर प्रोजेक्ट की छवि सोशल मीडिया के जरिये खराब करने की कोशिश की जाती है। जब बिल्डर दबाव में आ जाता है तो सीधे प्रति फ्लैट 20 से 25 लाख रुपये तक कीमत घटाने (Discounts) का दबाव बनाया जाता है। बदनामी के डर से जब बिल्डर औने-पौने दाम पर फ्लैट सौंप देता है, तो यही ब्रोकर्स उसी फ्लैट को आम खरीदारों को मनमाने और ऊंचे दामों पर बेचकर करोड़ों का मुनाफा कूटते हैं।
बदनामी के डर से मुंह बंद किए हुए हैं डेवलपर्स
इस संगठित ब्लैकमेलिंग से कई नामी डेवलपर्स मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित हो रहे हैं। नाम न छापने की शर्त पर एक जाने-माने बिल्डर ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया, “अगर हम पुलिस या कोर्ट जाते हैं, तो कानूनी प्रक्रिया लंबी खिंचती है। इस बीच सोशल मीडिया पर हमारे खिलाफ इतने नकारात्मक वीडियो और पोस्ट डाल दिए जाते हैं कि चालू प्रोजेक्ट की सेल्स ठप हो जाती है। बदनामी और भारी आर्थिक नुकसान के डर से कई डेवलपर्स चुपचाप इन ब्रोकर्स के आगे घुटने टेकने को मजबूर हैं।”
प्रॉपर्टी मार्केट में एक पूरा सिंडिकेट कर रहा यह काम
रियल्टी बाजार में बीते कुछ समय से नए प्रोजेक्ट्स की लॉन्चिंग की रफ्तार धीमी हुई है। मार्केट में इन्वेंट्री (तैयार या निर्माणाधीन फ्लैट्स) की कमी का पूरा फायदा यह सिंडिकेट उठा रहा है। बल्क बुकिंग के जरिए ये ब्रोकर्स प्रोजेक्ट की बड़ी यूनिट्स पर अपना कब्जा जमा लेते हैं। इसके बाद बिल्डर के पास केवल दो ही रास्ते बचते हैं या तो वह लाखों का नुकसान सहकर डिस्काउंट दे, या फिर बुकिंग कैंसिलेशन और लंबे कानूनी विवाद का जोखिम उठाए।
एक्चुअल होम बायर्स को सबसे अधिक हो रहा नुकसान
इस पूरे खेल का सबसे बड़ा नुकसान एक्चुअल होम बायर्स को हो रहा है। आज किसी रियल एस्टेट प्रोजेक्ट की बिक्री सिर्फ साइट विजिट और ब्रोशर से तय नहीं होती। संभावित खरीदार सोशल मीडिया, यूट्यूब वीडियो, ऑनलाइन रिव्यू और डिजिटल चर्चाओं के आधार पर भी प्रोजेक्ट के बारे में राय बनाते हैं। अगर किसी अच्छे प्रोजेक्ट के खिलाफ जानबूझकर लगातार नकारात्मक प्रचार किया जाता है, तो संभावित खरीदार उससे दूरी बना लेता है। यानी जिस होम बायर के लिए सोशल मीडिया जानकारी का माध्यम होना चाहिए, वही उसके लिए भ्रम का कारण बन रहा है।
सवाल सिर्फ बिल्डर का नहीं, पूरे सिस्टम का है?
रियल एस्टेट के जानकारों का कहना है कि अगर किसी प्रोजेक्ट में वास्तव में निर्माण सामग्री या देरी की समस्या है, तो उसके लिए RERA और उपभोक्ता अदालत जैसे कानूनी रास्ते मौजूद हैं। लेकिन जब किसी प्रोजेक्ट को पहले ‘घटिया’ बताकर डिस्काउंट लिया जाए और फिर उसी को ‘प्रीमियम’ बताकर बाजार में महंगे दाम पर बेचा जाए तो यह सीधा-सीधा फ्रॉड है। बिल्डर और बायर्स के बीच का यह टूटता भरोसा अगर जल्द नहीं संभाला गया, तो पूरा रियल एस्टेट बाजार इस सिंडिकेट की भेंट चढ़ जाएगा।
रियल एस्टेट से जुड़े लोग इस ब्लैमेलिंग को रोकने के लिए गहन जांच की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस बात की जांच होनी चाहिए कि जो लोग इन सोसाइटियों को बदनाम कर रहे हैं, उन्होंने और उनके रिश्तेदारों ने सोसाइटियों में कितने फ्लैट खरीदे हैं। क्योंकि कुछ लोगों ने सोसाइटियों को बदनाम करके सस्ते में फ्लैट खरीदने और बेचने को अपना बिजनेस बना लिया है।
सरकार और प्रशासन अगर इस मामले की गहन जांच करेंगे तो उन्हें पता चलेगा कि यह सिंडिकेट किस हद तक लोगों के घरों और शहर को बदनाम करके कमाई कर रहा है। इनमें से ज्यादातर लोग डिफॉल्टर हैं। कोई अपनी सोसाइटी में बिजली का डिफॉल्टर है, कोई मेंटेनेंस का डिफॉल्टर है और कुछ किराएदार भी इसमें शामिल हैं, जो सस्ते में घर खरीदना चाहते हैं। जितनी ज्यादा सोसाइटी बदनाम होगी, उतने ही सस्ते में उन्हें घर खरीदने का मौका मिलेगा।