श्रीप्रकाश शर्मा,
लेखक, प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, मामित, मिजोरम
22 अप्रैल को जबकि पूरी दुनिया में विश्व पृथ्वी दिवस का आयोजन हो रहा है तो पृथ्वी के वजूद को महफूज़ रखने में जल की महत्ता के बारे में चीन की एक लोक कथा की स्मृति ताज़ी हो जाती है । कहते हैं कि किसी विशाल प्रदेश के राजा को आखेट का बहुत शौक था । एक दिन राजा अपने मंत्री एवं सिपाहियों के साथ शिकार करते – करते बहुत दूर घने जंगल में निकल गये और इस प्रकार उन्हें वक्त का पता ही नहीं लग पाया । वे सभी घबराहट में जल्दी -जल्दी अपने प्रासाद वापस लौटने लगे । किन्तु राजा को बड़ी तेज प्यास लगी हुई थी । उनके सिपहसलारों ने अपने अन्नदाता की प्यास बुझाने के लिए पानी की काफी तलाश की, किन्तु उस बियावान घने जंगल में उन्हें कुछ नहीं मिला।
अंत में उन्हें कुछ दूर पर एक झोंपड़ी दिखाई दी । राजा उसी झोंपड़ी की दिशा में निकल पड़े । वहां पहुँचने पर उन्होंने देखा कि एक महात्मा घोर तपस्या में लीन थे । प्यास की तीव्रता को महसूस करते हुए राजन ने उस महात्मा की साधना में खलल डालते हुए विनती किया, “मुनिवर, मैं पास के रियासत का सम्राट हूँ तथा प्यास के मारे मेरी जान निकल रही है । आपके पास जल अवश्यमेव होगा, मुझ पर दया कीजिये और कृपा करके थोड़ा- सा जल मुझे दे दीजिये ।”. महात्मा जी राजा के इस प्रार्थना को सुनकर अपनी आँखें खोली तो सामने में राजा बेहोश तथा बेसुध पड़ा हुआ था । उनके ओंठ सूखे हुए थे और वह बड़ी मुश्किल से खड़ा हो पा रहा था ।
“राजन, मेरे पास जल तो है, किन्तु मैंने उसे अपने उपयोग के लिए संचित कर रखा है । भला अपने उपयोग के हिस्से के उस जल को मैं आपको क्यों दूं? आप और कहीं ढूंढ लीजिये,” महात्मा ने कहा.
“मुनिवर, मुझे बहुत अधिक जल की आवश्यकता नहीं है । आप मुझे कुछ घूँट ही पानी दे दीजिये ताकि मेरा गला तर हो पाए और मेरी जान बच जाए । यदि आप मुझे इतना भी जल नहीं देंगे तो कदाचित प्यास के मारे मेरी मृत्यु हो जायेगी ।”, राजा ने महात्मा से अतिविनीत स्वर में याचना किया.
महात्मा ने फिर कहा, “आप समझते क्यों नहीं राजन, जिस जल को मैंने स्वंय की जीवन रक्षा के लिए सुरक्षित रखा है, उसे भला मैं किसी दुसरे व्यक्ति को क्यों दूंगा? आप कहीं और जल की तलाश कर अपनी प्यास बुझा लीजिये.”
राजा को अब ऐसा लगने लगा था कि महात्मा जी उन्हें अपने संचित जल में जरा भी उन्हें देने वाले नहीं हैं तो वे काफी हताश हो गये । उनके सामने अपनी मृत्यु बड़ा निकट प्रतीत होने लगा । राजा ने प्रार्थना के तुणीर का अपना अंतिम तीर फेंका और महात्मा जी से विनती कर बड़े ही निराश होकर कहा, “महात्मा जी, आप चाहें तो मेरा पूरा राज-पाट ले लीजिये, किन्तु मेरी जीवन रक्षा के लिए अनिवार्य दो घूँट जल दीजिये । जब मैं खुद जीवित नहीं रहूँगा तो फिर यह साम्राज्य मेरे लिए क्या महत्व रखता है? मैं जल के चंद घूँट पाने के लिए अपना सब कुछ समर्पित करने को तैयार हूँ । लेकिन आप कृपा करके मुझे जीवन रक्षा के लिए थोड़ा-सा जल दे दीजिये । आपका यह उपकार मैं अंतिम सांस तक नहीं भूल पाऊँगा । ”
“राजन! तो इसका यही आशय है कि जिस राज-पाट के लिए तुमने इतने रक्तपात किये और कितने निर्दोष लोगों की जान ले ली और जिसको हासिल करने के लिए अपने मन के शुकून को खोया है, उस सम्पूर्ण रियासत की कीमत महज चंद घूंट जल ही है? धिक्कार है, ऐसे साम्राज्य को तथा ऐसी लिप्सा को जो अपने जीवन में सुख के शाश्वत गंगोत्री को देख नहीं पाता है, जो कि तुम्हारी अपनी आँखों के सामने इतनी सुलभता से प्राप्य है”.
महात्मा की बातों को सुनकर गोया राजा के ज्ञान चक्षु खुल गये हों । आज उन्हें अपने जीवन में पहली बार सच्चे सुख की प्राप्ति के रहस्य का ऐहसास हुआ । सच पूछिये तो राजा और मुनि की यह तत्वदर्शी बातें किसी लेखक के लिए कहानी का एक अच्छा प्लाट साबित हो सकता है किन्तु इसमें अन्तर्निहित जल के जीवनदायी महत्व के सन्देश को कतई नाकारा नहीं जा सकता है ।
साओ पाउलो प्रायः 13 मिलियन आबादी के साथ ब्राज़ील के सबसे बड़े और सर्वाधिक औद्योगिक शहरों में शुमार किया जाता है। किसी समय इस शहर को “सिटी ऑफ़ ड्रिज़ल” अर्थात “झींसियों का नगर” कहा जाता था, क्योंकि यहाँ पर वातावरण में इतनी अधिक आर्द्रता होती थी कि पूरे शहर में हर वक़्त बूंदा-बांदी-सी होती रहती थी । एक सुबह जब साओ पाउलो के मीडिया ने वहाँ के लोगों को घबराहट और आतंक में पानी के लिए अपने घरों के बेसमेंट्स, फर्श और पार्किग क्षेत्रों को खोदने के हृदयविदारक दृश्यों को छापा और टेलीविज़न पर दिखाया तो दुनिया की नजर ब्राज़ील के गहराते जल संकट की तरफ गए बिना नहीं रह पाया।
सच पूछिये तो पानी के लिए साओ पाउलो के लोगों के द्वारा डर कर अपने घरों के बेसमेंट्स को खोदने के दृश्यों में एक डरावना स्याह सच छुपा हुआ है, एक भयंकर चेतावनी छुपी हुई है कि जल संकट आनेवाले दशकों में महज हमारे लिए एक समस्या नहीं बल्कि धारणीय मानव अस्तित्व पर ही एक बड़े प्रश्न चिह्न के रूप में खड़ा हो सकता है । साओ पाउलो एक प्रतीक है, एक प्रतिबिम्ब है और सबसे अधिक एक चेतावनी है । जब भी जल संकट का प्रश्न हमारे सामने आता है तो पूरी धरती का दो-तिहाई भाग के जल से भरे होने का सच हमें दिग्भ्रमित कर जाता है। हैरत की बात तो यह है कि धरती के 70 प्रतिशत भाग में फैले हुए जल के साम्राज्य में महज 3 फीसदी जल ही मानव के उपयोग के लायक है।
किन्तु यही हमारे दुःख और दुविधा की कहानी का अंत नहीं है । हम इस सच्चाई को जानकर विस्मित हुए बिना नहीं रह पायेंगे कि इस तीन प्रतिशत ताजे पेय जल के दो-तिहाई से भी अधिक भाग ग्लेशियर्स में फंसे हुए हैं । कुल मिलाकर केवल एक प्रतिशत पानी ही विश्व के करीब आठ अरब आबादी के दैनिक जीवन में विभिन्न कार्यों के उपयोग के लिए शेष बचा रह जाता है । यदि 70 प्रतिशत जल से घिरे भूभाग में केवल एक प्रतिशत पानी ही मानव के पहुँच और प्रयोग के लिए उपलब्ध हो तो दुनिया में जल संकट की गंभीरता का बड़ी आसानी से कयास लगाया जा सकता है। यही कारण है कि आज पूरी दुनिया में भारत की आबादी के बराबर का अर्थात 1.3 बिलियन लोग जल की पहुँच से बाहर हैं। भारत और चीन की आबादी को यदि एक साथ मिला दें तो दुनिया की लगभग 3 बिलियन आबादी साल में कम-से-कम दो महीने गंभीर जल संकट का सामना करने के लिए अभिशप्त होते हैं।
जल संकट के दुःख की कहानी का यह भी अंत नहीं है क्योंकि जल संकट एक है और इसका प्रभाव युगांतकारी और जानलेवा है। अर्थव्यवस्था से लेकर पारितंत्र, परिवार से लेकर पर्यावरण, व्यक्ति से लेकर विश्व – सभी जल संकट के कारण समस्याओं के भंवर में फंसा हुआ है। यहाँ पर आत्म-विश्लेषण का एक अतिमहत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक प्रश्न यह उठ खड़ा होता है कि आखिर जल संकट सरीखे गंभीर समस्या के बारे में हमारी नींद कब खुलेगी।
एक सर्वे के अनुसार पूर्व के सात दशकों में विश्व की आबादी दोगुनी से भी अधिक हो गयी है और उसी के साथ पेय जल की उपलब्धता और लोगों की वहाँ तक पहुँच की स्थिति भी बद-से-बदतर होती जा रही है। इसके दूरगामी प्रभाव के रूप में विश्व में स्वच्छता की स्थिति भी काफी प्रभावित हुई है। गंदे पानी के उपयोग से आबादी का डायरिया, हैजा, टाइफाइड ज्वर और अन्य कई बीमारियाँ से ग्रसित होने का खतरा बढ़ता जा रहा है। मेडिकल साइंस का यह मानना है कि विश्व की लगभग 90 फीसदी बीमारियाँ केवल गंदे और दूषित जल के पीने से उत्पन्न होते हैं । केवल डायरिया से ही विश्व में 2 मिलियन बच्चे हर वर्ष असमय ही काल कवलित हो जाते हैं।
ज़ाम्बिया की राजधानी लुसाका शहर में एक प्रसिद्द चिड़ियाघर है । इस चिड़ियाघर में एक पिंजड़ा ऐसा है जिसमें कोई भी जानवर नहीं है। उस पिंजड़े में जब दर्शक प्रवेश करता है तो अन्दर में एक आदमकद शीशा लगा होता है। जब दर्शक इस आईने में देखता है तो उस पर लिखा होता है, “दुनिया का सबसे खतरनाक जानवर ।” यदि गहराई से आत्म-विश्लेषण करें तो यह समझते देर नहीं लगती है कि अन्य प्राकृतिक और मानवीय संकटों की तरह जल संकट भी मानव-निर्मित है। घंटों नलों का बहते रहना, दैनिक क्रियाओं के लिए बिना किसी विवेक और विचार के जल का लापरवाही से उपयोग करना इत्यादि हमारे लिए समस्याएं खड़ी करती हैं। कृषि समस्त उपलब्ध जल का 70 प्रतिशत उपयोग करता है। निस्संदेह कृषि हमारे जीवन के अस्तित्व से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है लेकिन यह जानकर आपको हैरत होगी कि कृषि में उपयोग किये गये कुल जल का 60 फीसदी का लीकेज के कारण अपव्यय हो जाता है । यहाँ पर हमें गहराई से सोचने की दरकार है।
स्लोवाकिया की एक कहावत है, “शुद्ध जल विश्व की प्रथम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण औषधि है ।” आशय यह है कि एक स्वस्थ और संतुलित जीवन जीने के लिए शुद्ध और पर्याप्त मात्रा जल की उपलब्धता पहली और अनिवार्य शर्त के रूप में शुमार होता है । हमें अपने अंतर्दृष्टि, सोच के तरीके और जीवन शैली में परिवर्तन लाने की दरकार है। सोच कर देखें तो इस दुनिया में वह स्थिति कितनी भयंकर होगी जबकि पानी का एक बूंद भी हमारे उपयोग के लिए मयस्सर नहीं होगा ।आज हमने यदि इस गंभीर समस्या पर संजीदिगी से विचार नहीं किया तो कदाचित कल इस विशाल वसुधा पर निवास कर रहे लगभग 800 करोड़ आबादी इस समस्या पर सोचने के लिए बचे नहीं रहेंगे ।
