श्रीप्रकाश शर्मा,
लेखक, प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, मामित, मिजोरम
जीवन के साथ समस्याओं का संबंध एक चिरंतन सत्य है जो हर काल के साथ शाश्वत रूप से चलता आ रहा है । कदाचित इस सच से हम बिलकुल इनकार नहीं कर सकते हैं कि जीवन है तो समस्याएं अपरिहार्य रूप से होंगी क्योंकि जीवन और समस्याएं एक दुसरे के पर्याय के रूप में विद्यमान होती हैं । जीवन का अस्तित्व नहीं रहने पर समस्याएं भी नहीं रहती हैं, क्योंकि जीवन की समाप्ति के साथ समस्याओं का भी अंत हो जाता है ।
इसका आशय यह भी है कि यदि किसी व्यक्ति को अपने जीवन में विविध प्रकार की समस्याओं से जूझना पड़ता है, उनका समाधान ढूँढने के लिए भागना होता है, संघर्ष करना पड़ता है, तो इसका साधारण – सा अर्थ यही है कि वह व्यक्ति जीवित है । मृत व्यक्ति को न तो समस्याएं आती हैं और न ही उन्हें उनपर नियंत्रण पाने के लिए कोशिश करने की जरुरत होती हैं । समस्याओं का यह स्वरुप इस धरती पर मानव जीवन के अस्तित्व की एक महत्वपूर्ण कसौटी के रूप में कार्य करता है ।
यदि समस्याओं के बारे में गंभीरता से विचार करें तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँच पाते हैं कि सभी समस्यायों की एक ही प्रकृति होती हैं और वह यह है कि वे कभी भी स्थायी नहीं होती हैं । समस्याएं आती हैं और फिर एक निश्चित अवधि के बाद वे खत्म भी हो जाती हैं ।
किन्तु समस्याओं के बवंडर में फंसा हुआ इंसान समस्याओं की क्षणभंगुरता के बारे में सोच नहीं पाता है । वह अपने आपको हारा हुआ महसूस करता है । उसे यही लगता है कि वह इस धरती पर का एक अकेला इंसान है जो समस्याओं से घिरा हुआ और इसलिए वह खुद को बहुत शापित महसूस करता है । लेकिन सच तो यही है कि मानव जीवन में ऐसी कोई भी समस्या नहीं होती है जो स्थायी होती हो । इसलिए समस्याओं के बारे में चिंता निरर्थक है । इनके बारे में निरंतर तनाव में रहकर अवसादग्रस्त होना जीवन को और भी कठिन बनाना होता है ।
लामाओं के धर्म में कहा गया है कि समस्याओं के केवल दो ही प्रकार होते हैं – पहला प्रकार ऐसा होता है जिनके कोई-न-कोई समाधान अवश्य होते हैं । अतः इस प्रकार की समस्याओं के बारे में चिंता करना बेकार है । जबकि दूसरी प्रकार की समस्याएं ऐसी होती हैं जिनका कोई समाधान नहीं होता है। इन समस्याओं के समाधान के लिए इंसान कितनी भी कोशिश क्यों न कर ले लेकिन परिणाम शून्य ही निकलता है । इसीलिए इस प्रकार की समस्याओं के बारे में भी चिंता करना विवेकपूर्ण कार्य नहीं है । आशय यही है कि मानव जीवन में आनेवाली विविध प्रकार की समस्याएं जीवन के अनिवार्य और अभिन्न अंग होते हैं जिनको टाला नहीं जा सकता है ।
लेकिन यहाँ पर एक अतिमहत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि आखिर दुःख के दिनों में और कष्ट के क्षणों में भी बिना विचलित हुए जीवन को कैसे संतुलित और सामान्य रखा जाए? विपरीत और अनचाही परिस्थितियों में भी बिना घबराये हुए और विचलित हुए जीवन को कैसे जिया जाए?
प्रसिद्द अमेरिकी लेखक मार्क ट्वैन से एक बार उनके दोस्तों ने एक प्रश्न पूछा, “ मानव जीवन में तीन सर्वोत्तम चीजें क्या हैं?” इस प्रश्न का उन्होंने जो उत्तर दिया था, उसमें मानव जीवन की एक बड़ी कड़वी सच्चाई छुपी हुई है, “मानव को कभी भी जन्म नहीं लेना चाहिए । यदि जन्म ले भी ले तो उसके बाद तुरंत मर जाना चाहिए । सबसे अंत में यदि तब भी जीवन बचा रह जाए तो शीघ्रता से मरने की कोशिश करनी चाहिए ।” आशय यही है कि मानव जीवन निरंतर संघर्ष की अबूझ कहानी है और जीवन जीना आसान नहीं होता है ।
अंग्रेजी में एक कहावत काफी चर्चित है और वह है – “एंड दि शो मस्ट गो ऑन।” अर्थात शो अवश्य जारी रहनी चाहिए । इस उक्ति का सीधा-सा आशय यह है कि जीवन में परिस्थितियां चाहे कितनी ही विकट और प्रतिकूल क्यों न हो, हमें कभी भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और और न ही कभी धैर्य खोना चाहिए । सकारात्मक विचार और नित्य नए उम्मीद के साथ हमें निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए ।
इस सन्दर्भ में एक दृष्टांत काफी प्रेरणादायी है । कहते हैं कि मानव का जीवन किसी नदी पर बने पुल के नीचे बहने वाले पानी की तरह होना चाहिए । नदी पर बने पुल के नीचे से जो पानी एक बार बहकर आगे निकल जाता है वह अपने पूर्व स्थान पर कभी भी वापस नहीं लौटता है । वह अपनी भूमिका निभा चुका होता है और वही उसके जीवन का अंत भी होता है । फिर जब भी पुल के नीचे से पानी गुज़रता है तो वह पानी नया होता है ।
आशय यह है कि जीवन में एक बार जो घटना घट जाए तो उस घटना के बारे में कभी भी दुबारा सोचने की आवश्यकता नहीं है । ऐसा करने से इंसान बेकार की चिंताओं और तनावों से मुक्त रहता है और जीवन की खुशियाँ महफूज़ रहती हैं ।
महान गणितज्ञ पायथागोरस अपने शिष्यों को एक ही पाठ प्राथमिकता से सिखाते थे और वह था – “ टू लिव फॉर दि डे ओनली ।” अर्थात “केवल आज के लिए जिओ ।” कल के लिए जीने की चाहत में हम प्रायः आज की खुशियों का गला घोंट देते हैं जो किसी भी लिहाज से एक संतुलित और स्वस्थ जीवन की पहचान नहीं है ।
राल्फ वाल्डो एमर्सन ने एक बार कहा था, “आपके जीवन में आपके अतिरिक्त कोई भी व्यक्ति शांति और ख़ुशी नहीं ला सकता है ।” जीवन में जब कभी खुद को उदासी के भंवर में पायें और उससे बाहर निकलने की कोई राह नहीं दिख रही हो तो यही सोचें कि कोई भी सुरंग कितना ही लंबी और अंधकारपूर्ण क्यों नहीं हो उसका कोई – न – कोई एक अंत जरुर होता है ।
कहते हैं कि रात्रि के अंतिम प्रहर में सबसे अधिक घना अँधेरा होता है और उसी प्रहर के बाद ही उजाला भी होता है । अर्थात जब आपको अपने जीवन में यूँ लगने लगे कि आप मुसीबतों से घिर गये हैं या फिर परिस्थितियां हर तरफ से आपके प्रतिकूल होती जा रही हैं या फिर आपके जीवन में संकट और भी अधिक गहराता जा रहा है तो निराश होने की बजाय मन में विश्वास रखिये कि आपके जीवन के दुःख भरे दिनों का अवसान होने वाला है, और शीघ्र ही खुशियों से लबरेज जीवन की सुबह का सूर्य फूटने वाला ही है ।
