युवा, माइग्रेंट्स और महिलाएं तय करेंगी कौन बनेगा बिहार का अगला मुख्यमंत्री, ये संकेत कर रहे इशारा

 

 

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान हो चुका है। दूसरे चरण का मतनदान 11 नवंबर को है। वहीं, वोटों की गिनती 14 नवंबर को होगी। इस बार चुनाव बड़े बदलाव का संकेत दे रहा है। पहले चरण में रिकॉर्ड 64.6 % मतदान हुआ है, जो राज्य की राजनीति में बड़े बदालाव का संकेत माना जा रहा है। चुनावी जानकारों का कहना है कि जब वोटर अपनी कतार खुद बनाकर बूथ पर जा रहा है, तो इससे बदलाव के संकेत साफ मिल रहे है। ऐसे में क्या इस बार चुनाव “जात-राजनीति” को पीछे छोड़ दिया है या फिर उसे उसी रंग में नया आकार दे रहा है? या इस बार का चुनाव युवा, माइग्रेंट्स और महिलाएं तय करेंगी? उच्च मतदान अक्सर बदलाव का संकेत माना जाता रहा है। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि इस बार चुनाव के बाद किसके सर पर मुख्यमंत्री का ताज सजेगा।

गठबंधन-दल और नए राजनीतिक खिलाड़ी

बिहार 2025 की राजनीति में तीन बड़ा नाम हैं — नीतीश कुमार (जेडीयू/एनडीए), तेजस्वी यादव (आरजेडी/महो गठबंधन) और प्रशांत किशोर (जन सुराज)। प्रशांत किशोर ने 243 सीटों पर पूरी चुनावी लड़ाई छेड़ दी है, जिससे ‘तीसरा मोर्चा’ बनने की संभावना बढ़ रही है। इन सबका असर यह है कि बिहार की राजनीति अब सिर्फ दो-गठबंधन की लड़ाई नहीं रही — नया खिलाड़ी, नया मुद्दा और नया राजनीतिक-मानचित्र उभर रहा है। परिणाम यह दिखा सकते हैं कि इस नई त्रिकोणीय लड़ाई में कौन आगे होगा।

क्या एनडीए की होगी वापसी?

वर्तमान सर्वेक्षणों के अनुसार जनता दल (यू)-नेतृत राष्ट्रीय जनाधिकार गठबंधन (एनडीए) को 243 सीटों में लगभग 120-140 सीटें मिलने की संभावना जताई जा रही है। दूसरी तरफ महा‑गठबंधन को 93-112 सीटों का अनुमान है। इस हिसाब से एनडीए को बहुमत मिल सकता है, लेकिन यह साफ-सबूत नहीं है। लेकिन विपक्ष – खासकर आरजेडी-केंद्रित और जन सुराज विकल्प – इस बढ़ोतरी को परिवर्तन-संकेत के रूप में देख रहा है। बिहार की राजनीति इस बार सिर्फ सत्ता-परिवर्तन की नहीं है, बल्कि सत्ता-शैली, मतदाता-प्राथमिकता और गठबन्धन-ढांचे का परिवर्तन भी तय करेगी।

इन मुद्दों का दिखेगा असर

युवा मतदाता और रोजगार प्रमुख मुद्दा: बिहार में लगभग 7-8% बेरोजगारी दर और हर साल रोजगार के लिए होने वाला पलायन एक बड़ा चुनावी मुद्दा है . 18-35 आयु वर्ग के मतदाता, जो कुल मतदाताओं का लगभग एक तिहाई हैं, के पास महत्वपूर्ण भूमिका है . तेजस्वी यादव ने प्रति परिवार एक सरकारी नौकरी का वादा किया है, जबकि एनडीए ने औद्योगिक प्रोत्साहन के माध्यम से एक करोड़ रोजगार के वादे का जवाब दिया है।

जातीय समीकरण और नए दावेदार: जाति राजनीति का आधार बनी हुई है, लेकिन मतदाताओं में बदलाव की इच्छा देखी जा रही है . प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी एक ‘जाति-तटस्थ’ विकल्प पेश कर रही है और 5-10% मतों के साथ 30-40 सीटों पर मुकाबले को प्रभावित कर सकती है . चिराग पासवान का दल भी एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी है।

प्रशांत किशोर का जन सुराज – तीसरा मोर्चा या विफल प्रयास?

प्रशांत किशोर ने जन सुराज से बिहार चुनाव में तीसरा विकल्प पेश किया, लेकिन क्या यह वाकई में बन पाया। चुनावी जानकारों का कहना है कि नहीं। अभी प्रशांत किशोर को और मेहनत करना होगा। बिहार में इस बार भी एनडीए बनाम महागठबंधन में ही लड़ाई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *